इश्क़ से तू बे-ख़बर था, बे-ख़बर अच्छा लगा By Shreyash Tripathi

ग़ज़ल

इश्क़ से तू बे-ख़बर था, बे-ख़बर अच्छा लगा

 

इश्क़ से तू बे-ख़बर था, बे-ख़बर अच्छा लगा

जान कर अनजान बनने का हुनर अच्छा लगा

 

मंजिलें आसाँ लगी जब रास्तों पर तुम मिले

साथ तेरे चार ग़ज का ये सफ़र अच्छा लगा

 

आरजू थी हम रहें अब जिंदगी भर हमसफ़र

दो ही पल का था मगर तू हमसफ़र अच्छा लगा

 

काम की लगती नहीं हैं ये दवाएं अब मुझे

ज़ख्म पर तेरी दुआओं का असर अच्छा लगा

 

बस छुआ तुमने मुझे औ’ दर्द सारे मिट गए

यूँ तिरा मरहम लगाना चारागर अच्छा लगा

 

रूह वापिस आ गयी, जैसे किसी इक लाश में

लौट आने से तिरे महबूब, घर अच्छा लगा

 

हुस्न पर तेरे ग़ज़ल कहना लगा मुश्किल बहुत

सर से लेकर पाँव तक तू हर नज़र अच्छा लगा

 

इस कदर रुसवा किया है महफ़िलों में यार ने

 

जिंदगी तन्हाई में करना बसर अच्छा लगा

 

क्या हुआ साहेब गर है बेवफ़ा महबूब वो

झूठ था इज़हार उसका पर मगर अच्छा लगा

-Shreyash Tripathi
@saheb_shrey

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