झुके कंधे बताते हैं कि कितना भार होता है By Shreyash Tripathi

ग़ज़ल

झुके कंधे बताते हैं कि कितना भार होता है

 

झुके कंधे बताते हैं कि कितना भार होता है
अकेले बाप के ऊपर यहाँ परिवार होता है

 

कि जिसने मुफ़्लिसी में भी कभी बेचा नहीं ख़ुद को
वही औलाद की ख़ातिर मगर बाज़ार होता है

 

अँधेरे से कमा कर रौशनी सब के लिए लाए
दिया बनकर जले जब बाप तब त्यौहार होता है

 

वो पढ़ लेता है ग़म औलाद की आँखों में ही सारे
हो अनपढ़ बाप फिर भी वो बड़ा हुशियार होता है

 

दुखा के बाप का दिल मंदिरों में जा रहे हो क्यों
पिता के रूप में भगवान का अवतार होता है

 

गिरे “साहेब” तो वो थाम लेता है उसे बढ़ कर
अकेलेपन में मेरा बाप ही बस यार होता है

-Shreyash Tripathi
@saheb_shrey

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