बयान-ए-दर्द जब करता हूँ मैं ऊला-ओ-सानी में By Shreyash Tripathi

ग़ज़ल

बयान-ए-दर्द जब करता हूँ मैं ऊला-ओ-सानी में

 

बयान-ए-दर्द जब करता हूँ मैं ऊला-ओ-सानी में

बहुत मिलती मुहब्बत है मुझे फिर शेर-ख़्वानी में

 

सभी हैं पूंछते के इश्क़ करके क्या मिला आखिर?

बताता हूँ सुकूँ मिलता मुझे इस रायगानी में

 

जहाँ भर में जिसे मैं ढूंढता फिरता रहा अक्सर

मिला बन बेवफ़ा किरदार वो मेरी कहानी में

 

सभी अपनों से याँ मुझको छुपाना अश्क़ पड़ता है

हुई बरसात ऐसी मिल गए सब अश्क़ पानी में

 

बहुत ही मुस्कुराता था कभी महफ़िल में यारों की

नज़र किसकी लगी है आज उस शादमानी में

 

सुखनवर जब सुनाते हैं मुहब्बत हीर-रांझा की

तसव्वुर मैं तिरी करता हूँ उनकी हर बयानी में

 

खफ़ा साहेब हूँ तुमसे मैं बस इस बात को लेकर

खुदी को बेंच आये तुम न जाने किस गुमानी में

-Shreyash Tripathi
@saheb_shrey

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