बाग़ में से जब वो गुज़री फूल बे-कल हो गए By Ashutosh Pandey

ग़ज़ल

बाग़ में से जब वो गुज़री फूल बे-कल हो गए

उस फ़ज़ा की फिर महक से सारे पागल हो गए

 

सूखे जब इक फूल ने फिर अपना दुख ज़ाहिर किया

उसने देखा आसमाँ को और बादल हो गए

 

इक दफ़ा निकलीं थी छत पर अपनी ज़ुल्फ़ें खोल वो

चाँद तारे सब के सब फिर उसके क़ायल हो गए

 

छाँव में पेड़ों के नीचे अपनी हिजरत लिखता था

बाद में देखा कि सारे पेड़ बे-फल हो गए

 

ख़ाब में सिरहाने मेरा हाँथ थामे बैठी थी

उँगलियाँ जब मोड़ी तो फिर ख़ाब ओझल हो गए

 

कब तलक रोता रहे ‘आबिद’ युँ उसकी याद में

आजिज़ी के लम्हें तो याँ अब मुसलसल हो गए

 

©पाण्डेय जी ‘आबिद’

-Ashutosh Pandey
@p.a.n.d.e.y_j.i

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