मख़मली पल्लू का बिस्तर याद है By Shreyash Tripathi

ग़ज़ल

मख़मली पल्लू का बिस्तर याद है

 

मख़मली पल्लू का बिस्तर याद है

शहर-ए-गम में गांव का घर याद है

 

इक शराबी बाप माँ को मारता

वहशियत का ज़हर मंजर याद हैं

 

पीठ पर अब भी हरे हैं, ज़ख्म सब

अपनों का मारा वो ख़ंजर याद है

 

चार – सू फैली हुई थी भुखमरी

खेत का होना भी बंजर याद है

 

पेट की वो आग बचपन खा गयी

मुफ़्लिसी में खायी ठोकर याद है

 

अश्क़ के आगे हुए मजबूर तब

फिर मिरा होना सुख़नवर याद है

 

यूँ नहीं साहेब मंजिल है हसीन

राह में दुनिया थी पत्थर याद है

 

-Shreyash Tripathi
@saheb_shrey

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