रात भर बस वस्ल की वो आरजू है माँगती By Shreyash Tripathi

ग़ज़ल

रात भर बस वस्ल की वो आरजू है माँगती

 

रात भर बस वस्ल की वो आरजू है माँगती

तिश्नगी उसके लबों का बस लहू है माँगती

 

जानती है वजह वो भी क्यूँ जुदा हम हो गए

राबता मुमकिन नहीं तो इश्क़ क्यूँ है माँगती

 

देखिए तो आप ये मासूमियत दिल की मिरे

चार-सू महबूब की बस रंग-ओ-बू है माँगती

 

मुन्तज़िर हो शहर भर फिरती तिरे दीदार को

ये नज़र हर अक्स तुमसा खूब-रू है मांगती

 

आज तक उन दोस्तों का रूठना है खल रहा

जिंदगी उन हमकदम से सुलह-जू है माँगती

 

हर ग़ज़ल देती सुकूँ है शाइरी दर शाइरी

बे-जुबाँ एहसास सारे बा-वजू है माँगती

 

यूँ नही आसान था “साहेब” होना सुर्ख़-रू

इक मुक़र्रर शेर कहना तुन्द-ख़ू है माँगती

-Shreyash Tripathi
@saheb_shrey

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