भला ख़ामोश क्यों रहना हज़ारों बात बाकी हैं By Shreyash Tripathi

ग़ज़ल

भला ख़ामोश क्यों रहना हज़ारों बात बाकी हैं

 

भला ख़ामोश क्यों रहना हज़ारों बात बाकी हैं
बयान-ए-दर्द-ओ-गम करने को तो नग़्मात बाकी हैं

 

खफ़ा लगता हूँ मैं तुझको मगर मैं सच बताऊं तो
तिरे ख़ातिर, मिरे दिल में कई जज़्बात बाकी हैं

 

रफाकत को निभाते वक्त सालों हो गए हैं पर
हमारे दरमियाँ अब तक वही शुबहात बाकी हैं

भला क्या हिज़्र ही है आखिरी चारा मिरे रहबर
अभी तो जिंदगी के ख़ुशनुमा लम्हात बाकी हैं

 

अधूरा अब नहीं ‘साहेब’; किस्सा इश्क़ का होगा
बयान-ए-इश्क़ करने को हिनाई हाथ बाकी हैं

 

-Shreyash Tripathi
@saheb_shrey

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